पोंगल

पोंगल

 

'पोंगल' दक्षिण भारत, मुख्य रूप से तमिलनाडु के सबसे लोकप्रिय व प्रमुख त्यौहारों में से एक है। पोंगल शब्द के दो अर्थ हैं। पहला यह कि इस दिन सूर्य देव को जो प्रसाद अर्पित किया जाता है वह पोंगल कहलाता है। दूसरा यह कि तमिल भाषा में पोंगल का एक अन्य अर्थ निकलता है अच्छी तरह उबालना। पोंगल एक फसली त्योहार है। यह त्यौहार हर साल जनवरी के मध्य में पड़ता है।
जिस प्रकार ओणम् केरलवासियों का महत्त्वपूर्ण त्योहार है । उसी प्रकार पोंगल तमिलनाडु के लोगों का महत्त्वपूर्ण पर्व है । उत्तरभारत में जिन दिनों मकर सक्रान्ति का पर्व मनाया जाता है, उन्हीं दिनों दक्षिण भारत में पोंगल का त्यौहार मनाया जाता है।


भारत एक कृषि प्रधान देश है । यहाँ की अधिकांश जनता कृषि के द्वारा आजीविका अर्जित करती है । आजकल तो उद्योगिकरण के साथ-साथ कृषि कार्य भी मशीनों से किया जाने लगा है । परन्तु पहले कृषि मुख्यत: बैलों पर आधारित थी । बैल और गाय इसी कारण हमारी संस्कृति में महत्त्वपूर्ण स्थान रखते हैं ।
भगवान शिव का वाहन यदि बैल है तो भगवान श्रीकृष्ण गोपालक के नाम से जाने जाते हैं । गायों की हमारे देश में माता के समान पूज्य मानकर सेवा की जाती रही है । गाय केवल दूध ही नहीं देती बल्कि वो हमें बछड़े प्रदान करती है जो खेती करने के काम आते हैं । तमिलनाडुवासी तो पोंगल के अवसर पर विशेष रूप से गाय, बैलों की पूजा करते हैं ।
यह त्योहार प्रतिवर्ष मकर संक्रान्ति के आस-पास मनाया जाता है । यह उत्सव लगभग तीन दिन तक चलता है । लेकिन मुख्य पर्व पौषमास की प्रतिपदा को मनाया जाता है । अगहन मास में जब हरे-भरे खेत लहलहाते हैं तो कृषक स्त्रियाँ अपने खेतों में जाती हैं ।


जिस प्रकार 31 दिसम्बर की रात को गत वर्ष को संघर्ष और बुराइयों का साल मानकर विदा किया जाता है, उसी प्रकार पोंगल को भी प्रतिपदा के दिन तमिलनाडुवासी बुरी रीतियों को छोड़ने की प्रतिज्ञा करते हैं ।
 इस अवसर पर सभी छोटे-बड़े लोग काम में आने वाली नई चीजे खरीदते हैं और पुरानी चीजों को बदल डालते हैं । नए वस्त्र और नए बर्तन खरीदे जाते हैं ।
नए बर्तनों में दूध उबाला जाता है । खीर बनाई जाती है । लोग पकवानों को लेकर इकट्‌ठे होते हैं, और सूर्य भगवान की पूजा करते हैं । मकर सक्रान्ति से सूर्य उत्तरायण में चला जाता है दिन बड़े होने लगते हैं । सूर्य भगवान की कृपा होने पर ही फसलें पकती हैं । किसानों को उनकी वर्ष भर की मेहनत फल मिलता है ।


उनका विचार है कि जिस प्रकार दूध का उफान शुद्ध और शुभ है उसी प्रकार प्रत्येक प्राणी का मन भी शुद्ध संस्कारों से उज्ज्वल होना चाहिए । इसलिए वे अन्त:करण की शुद्धता के लिए सूर्यदेव से प्रार्थना करते हैं .
पोंगल तमिल महीने 'थाई' के पहले दिन मनाया जाता है इसलिए इसे 'थाई पोंगल' भी कहते हैं। इस दिन लोग तड़के ही उठ जाते हैं और नए कपड़े पहनकर मंदिर जाते हैं, जहां विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
लोग पारम्परिक व्यंजन बनाते हैं। 'चकारई पोंगल' के साथ 'वेन पोंगल' भी बनाया जाता है। 'वेन पोंगल' चावल, दाल, घी और तले हुए काजू से बनाया जाता है। जब उबलते दूध में कच्चे चावल और दाल डाली जाते हैं तो लोग जोर-जोर से 'पोंगोलो पोंगल, पोंगोलो पोंगल' बोलते हैं।


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