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पहाड़-पुत्र मेघाणी

Tuesday, November 15, 2016 | 8:35:00 PM

' ... वह पहाड़-पुत्र मेघाणी’

काठियावाड़ की धरती पर, खिला अनोखा लाल,
देख-देख जिसको माता की आँखें हुई निहाल.

जंगल, झरने, पर्वत, नदियाँ, थे सब उसके मित्र,
लोकभाषा और लोक-साहित्य से, रचता वह कल्पना-चित्र.

कवि, लेखक, संशोधक, पत्रकार, बना वह स्वतंत्रता-सेनानी,
बहुमुखी प्रतिभा का बालक, नाम – झवेरचंद मेघाणी.

पिता का नाम था कालिदास, माता थीं – धोलीबाई,
सादगी, उच्च संस्कार उन्होंने, माता-पिता से ही पाई.

राजकोट में बीता बचपन, कालेज भावनगर में,
बड़े भाई की सेवा करने, पहुँचा बंगाल शहर में.

की नौकरी कलकत्ता में, बनकर 'पगड़ी‌ बाबू’,
गया विदेश पर शीघ्र ही लौटा, उसपे था वतन का जादू.

कूद पड़ा वह स्वातंत्र्य-युध्ध में, लगा जन-चेतना जगाने,
अपनी लेखनी से आजादी की पवित्र मशाल जलाने.

'राजद्रोही’ कहा अँग्रेजों ने, फिर भेज दिया उसे जेल,
वहाँ देशभक्त नेताओं के संग, हुआ फिर उसका मेल.

गाँधी ही आदर्श थे उसके, था देश-गान उसे प्यारा,
'राष्ट्रीय शायर’ की मिली उपाधि, बापूजी के ही द्वारा.

गुरुदेव के आमंत्रण पर, पहुँचा फिर शांतिनिकेतन,
लोकरचना और लोक-गीतों से, वहाँ जीता सबका मन.

'माणसाई’ जब हुआ सम्मानित, 'महिड़ा’ पारितोषिक से,
कर दिया अर्पण महाराज के नाम, क्या लेना उसे रकम से.

लीं अंतिम साँसें बोटाद में, घर उसका बना धरोहर,
वह निडर, विद्वान, देशभक्त, बन गया फिर इतिहास अमर.

'सोरठ तारां बहेता पानी’ और 'रढियाळी रात’,
हर जन-मानस जुड़ गया, उसके लोक-गीतों के साथ.

जन-जन उसने अलख जगाई, शौर्य, समर्पण, प्यार,
लोक-साहित्य की अमूल्य देन, उसके 'सौराष्ट्रनी रसधार’.

आज भी वह फिजा में गुजरात के – कहता है बहता पानी,
घर-घर बसा है गीतों में, वह पहाड़-पुत्र मेघाणी.

- अर्चना 'अनुप्रिया'

Posted By Archana Anupriya

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