Dua

Articles/Poems/Quotes

 
Posted on: 2/24/2017 7:59:00 PM

पटना के चप्पे चप्पे में देखो फैली मौज़े रवानी है
९०,श्री कृष्ण नगर का इतिहास बदल चूका
कथा किन्तु मन में
वही पुरानी है।
हम सब भाई बहनो का
क्या लड़कपन क्या जवानी थी
माँ पापा के प्रेम की भी अज़ब कहानी थी
पटना वीमेंस कॉलेज से सायंस कॉलेज तक जाती
प्रेम परवानी थी ; हायकोर्ट
जादूघर की अपनी ही अलग कहानी थी
कदम कुआँ का हाल न पूछो
अपने ही यहाँ सभी
लगते जैसे बेगाने हैं ,
वही होटल मौर्या जहाँ दो दिल
न जाने कितने एक होते जो
अनजाने हैं
दूरदर्शन में भी आते वही चेहरे नजर
जो कभी पहचाने हैं
कैसे कहूं क्या क्या कहूं पटना !
याद हमे तुम रखना पटना ,
गंगा की धरती यमुना पर आयी है। .

डॉ शेफालिका वर्मा

Posted on: 2/24/2017 7:45:00 PM

ॐ नमः शिवाय
अहाँ जीवन में राग भरू, अनुराग भरू
चिरहासमय उल्लासमय
मधुमास भरू !
जीवन के जीवन रह' दिय ,एहि में
मधु-धार बह' दिय'
फेर देखब की अछ ई जीवन
सुख़ सौभाग्यक पुलकित उपवन
जीवन विराटक दर्पण थीक
शोभा सुषमाक मधुवन थीक
आनंद भरल कैलास लोक
नहि कोनो अछ रोग सोक
शिव गौरीक नर्तन पावन
मधुमय मंगल जीवन थीक ई जीवन
शूल फूल वरदान थीक ,स्वेद कण मानव मस्तक केर
सम्मान थीक
सम्मानित जीवनक आदर अहाँ बनू..

महाशिवरात्रिक अशेष नमन अहाँ के ,,,,,,,

डॉ शेफालिका वर्मा

Posted on: 2/21/2017 7:33:00 PM

*'Your good heart will tell u where to go. Your sharp mind will tell u how to get there & your deep love for God will guide you on your way.'

Posted on: 2/21/2017 7:25:00 PM

जब जब भी तुम मेरे समीप आते हो
छू कर ना जाने कब
उर में मधु - मधुर पुलक भर देते हो

न जानू कितने वचन याद दिलाते हो ...

तुम्हारे मृदुल स्नेहिल संस्पर्श की तरंगे
ह्रदय में बेसुधि की सिन्धु बन लहर उठाती है

मंत्रमुग्ध मेरा कवि उसमे ड़ूब जाता है
मै खड़ी अकेली असहाय अवाक्
अनिवर्चनीय अनुभूति की कोमल कोमल
कली चुन
उसे गीतों में गूंथने के लिए
सजा कर रखने के लिए
छंद खोजती रह जाती हूँ
इस चित्र विचित्र विराट प्रेम को
महसूसती रह जाती हूँ.......

डॉ शेफालिका वर्मा

Posted on: 2/16/2017 8:51:00 PM

Life is a balance between holding on and letting go. ~ Rumi

Posted on: 2/16/2017 8:47:00 PM

Always go the extra mile. Aspire to be the best that you can be. Stay motivated at all times.

Posted on: 2/16/2017 8:40:00 PM

पंचवर्षीय योजनाओं की तरह हमारा देश
वादों और नारों पर
टिका है
कितने सारे कानून बेटियों के लिए बन गये
बेटे फिर भी बेचे जातें हैं
दहेज़ लेना स्टैट्स माने जाते हैं ----
मत करो बेटियाँ ख़रीदे हुए बेटो से शादी
जहाँ उनके पौरुष मारे जाते हैं ;
करो उस से शादी जिसमे पौरुष
ललाम हो
आत्मसम्मान ही नही
देश और नारी का सम्मान हो। .
माँ बनकर मत कीमत लगाओ
अपने अनमोल धन को
तुम शक्ति दोगी पिता भी न बेचेगा
अपने रतन को
देखो राम राज्य की हालत क्या हो गयी
दशरथ घूम रहे व्यापारियों के वेश में
कौशल्या तौल रही रामको
वास्तु बाँट में
आज गली गली रावण
घर घर में धोबी घूम रहे
राम उस समय भी न्याय नही कर सके
सीता के साथ
पत्नी न सही एक प्रजा के साथ-
फिर क्यों हो लाचार नारी
ख़रीदे हुए पति के साथ ,,----

डॉ शेफालिका वर्मा

Posted on: 2/15/2017 11:35:00 PM

रमा अपन घर नहिये बसा सकलीह
नै तँ अपन पति के दोस्त
बना सकलीह
नहि ते बच्चा सभक माय बनि सकलीह
जरलाहा मोबाइल नैहर
घरे ल आयल
बेटीक जीवन में अनजाने
माहुर घोर' लागल
छोट छोट बात नदीक लहरि जकाँ
एहि किनार से ओहि किनार
जाइत रहल
नव नव रचना गढ़ैत रहल
बुझनुक माय के अभाव में
बेटीक महल ढहैत रहल
नीक गप नीक सलाह के बदले
अहा हम्मर बेटी कतेक दुखी कनैत रहल
राजरानीक सुख भोगैत बेटी

मायक सुर में सुर मिलवैत रहल
अपन नेना भुटका कनैत
मायक संग लेल
मोबाइल में माय बेटीक हाल
लेत स्वयं ओकर भाग्य पर कनैत रहल
ओ अपन संसार नै बसा सकलीह
पति अपना के काज में डूबा देलक
बाल बच्चा पढ़' बाहर चलि गेल
वयस बीति गेल
समय ससरि गेल
'मायका' 'भायका ' बनि गेल
सब किछ अछैत
सब के रहैत
रमा असगर रहि गेल-----
मायक अभाव में मोबाइल निष्प्राण
भ' गेल
जे मोबाइल कतेको के जीवन सोझराय देलक
आय ओ रमाक जीवनक जपाल बनि गेल -------

रतन जी के एकटा पोस्ट सँ प्रभावित ,,,,

डॉ शेफालिका वर्मा

Posted on: 2/15/2017 11:24:00 PM

किसी ने कानों में गुनगुना दिया
संगिनी! फागुन आया
हरसाया मन ..
दौड़ी उपवन में सिहरता तन
फाग कहाँ
बसंत कहाँ ........

खंड खंड में
पेड़ों की शाखों पर
धरती पर अस्तव्यस्त
पुरवैया के साथ अलसाई धूप
गलबहियाँ दे बेखबर पड़ी थी
राग से भरी अनुराग रंग में रंगी
बसन्त के प्यार में लिपटी सी थी ...
पतझर की बारिश में भींगे से अलमस्त बसन्त..... .......

-Shefalika
Posted on: 2/3/2017 1:09:00 AM

मगध में शोर है कि मगध में शासक नहीं रहे
जो थे
वे मदिरा, प्रमाद और आलस्य के कारण
इस लायक
नहीं रहे
कि उन्हें हम
मगध का शासक कह सकें

लगभग यही शोर है
अवंती में
यही कोसल में
यही
विदर्भ में
कि शासक नहीं
रहे

जो थे
उन्हें मदिरा, प्रमाद और आलस्य ने
इस
लायक नहीं
रखा

कि उन्हें हम अपना शासक कह सकें
तब हम क्या करें?

शासक नहीं होंगे
तो कानून नहीं होगा

कानून नहीं होगा
तो व्यवस्था नहीं होगी

व्यवस्था नहीं होगी
तो धर्म नहीं होगा

धर्म नहीं होगा
तो समाज नहीं होगा

समाज नहीं होगा
तो व्यक्ति नहीं होगा

व्यक्ति नहीं होगा
तो हम नहीं होंगे

हम क्या करें?

कानून को तोड़ दें?

धर्म को छोड़ दें?

व्यवस्था को भंग करें?
मित्रो-
दो ही
रास्ते हैं :
दुर्नीति पर चलें
नीति पर बहस
बनाए रखें

दुराचरण करें
सदाचार की
चर्चा चलाए रखें

असत्य कहें
असत्य करें
असत्य जिएँ

सत्य के लिए
मर-मिटने की आन नहीं छोड़ें

अंत में,

प्राण तो
सभी छोड़ते हैं

व्यर्थ के लिए
हम
प्राण नहीं छोड़ें
मित्रो,
तीसरा रास्ता भी
है -

मगर वह
मगध,
अवन्ती
कोसल
या
विदर्भ
होकर नहीं
जाता।

- श्रीकांत वर्मा