Archana Anupriya
MA,LLM, Advocate and Visiting Faculty in MS University
Love Writing and Reading

Articles/Poems/Quotes

 
Posted on: 11/15/2016 8:29:00 PM

नारी

नारी की रचना से पहले विधाता ने
सोचा तो क ई बार होगा_
"इसी साहसी जीव के ऊपर संसार के
सृजन का भार होगा" ,
पर उस बनाने वाले ने तो कभी
कल्पना भी नहीं की होगी ,
कि जहाँ में जननी बनकर भी उसका
अपना ही ना कोई अधिकार होगा ।
" प्रेम,त्याग,विश्वास ,ममता की मूर्ति"_
इस रूप से तो प्यार होगा ,
लेकिन दुनिया को अपने स्वार्थ के आगे
नारी का हक ना स्वीकार होगा ।
देख नारी की दुर्दशा समाज में
ईश ने दृढ़ किया ये विचार होगा,
नारी शक्ति की पुनः स्थापना हेतु
अब बदलना यह संसार होगा ।
तभी सब ललनाएँ जाग उठी हैं,
कोई श्रम ना अब बेकार होगा,
हर घर की बेटी जब मान पाएगी
तभी तो जग में बहार होगा ।
अर्चना अनुप्रिया ।

Posted on: 11/15/2016 8:26:00 PM

भाग्य- विधाता

अँधेरा गम का,मायूसी का अब रहने दो,
आशाओं की किरणें फिजा़ में बहने दो,
उठो हौसलों, पंख बनो मेरे सपनों के,
'खुद अपना मैं भाग्य- विधाता'_ कहने दो ।
अर्चना अनुप्रिया ।

 

Posted on: 11/14/2016 7:39:00 PM

"नोट का तमाशा"

अजीब सा तमाशा आज बाजार में चलने लगा है,
हजार का नोट अब दस रुपये के नोट से जलने लगा है...
अदना और तुच्छ समझती रही जिसे दुनिया अब तक,
देखो तो जरा, आज कैसा खुशी से उछलने लगा है!!
भारी लगते थे जो सिक्के गोरियों के कमसिन पर्स में,
अब उन्हीं सिक्कों के लिए इन्सान बेतरह मचलने लगा है..
बड़ी बड़ी जगहों पर बहुत ऐश करते रहे पाँच सौ, हजार,
अब समाज में उनका रुतबा जरा जरा पिघलने लगा है...
लुभाते रहे हर वर्ग,हर मजहब को अपने रूप से हमेशा,
ब्युटीपार्लर जाकर हर बड़ा नोट अब रूप बदलने लगा है..
छोटे नोट एक दूसरे का हाथ थामे अपनी ताकत दिखा रहे
उनकी एकता से डर, हर बड़ा नोट अब सँभलने लगा है...
नोटों की इस उठापटक से हर इन्सान परेशान हुआ है,
खुद को सुल्तान कहने वाला भी सोचने समझने लगा है...
वक्त कब किस करवट बैठे, कोई कह सकता नहीं है,
अब नोट हो या इन्सान-सब वक्त के हाथों ढलने लगा है।

अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 11/9/2016 8:13:00 PM

 

कहते हैं दुनिया उगते सूर्य को ही प्रणाम करती है, परन्तु छठ की पूजा-विधि में पहले डूबते सूर्य की वंदना होती है जो इस पूजा को और खास बना देती है। इसके पीछे का दर्शन यह है कि "जो झुकता है, वही उठता है", अर्थात् झुके हुओं की वंदना अवश्य होनी चाहिए। अनादिकाल से चली आ रही छठ पूजा हमारी संस्कृति का द्योतक है।सूर्य एकमात्र प्रत्यक्ष देवता हैं, सृष्टि का आधार हैं और अपनी उष्मा से जीवन का संचार करते हैं। अतः इस पर्व के माध्यम से सूर्य की भक्ति की जाती है। यह पूजा कार्तिक शुक्ल पक्ष की छठी तिथि को होती है और संस्कृत में छठ स्त्रीलिंग है, अतः इस पूजा को छठी मैया के व्रत के नाम से भी जाना जाता है। छठ पूजा हमारे जीवन-दर्शन से जुड़ी है। छठी मैया की जय....!


.. अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 11/9/2016 8:04:00 PM

 

दिल्ली के प्रदूषण पर विशेष....

धुआं-धुआं सा फैला हुआ है चारों तरफ,
रोशनी भी निढाल सी है, कोहरे के इस शहर में;
निःशब्द मूक से खड़े हुए हैं पेड़-पौधे,
अँधियारा सा छाया हुआ है, भरी सी दोपहर में;
हैरान है इन्सान देख खुद अपनी करनी को,
घुटने लगीं हैं साँसें भी, अब तो फैले इस जहर में;
आँखें पथरायी सी अब तो बस जलने लगी हैं,
कितना कोई बचाए खुद को, जहरीली इस लहर में;
झटके दे-देकर जगा रही प्रकृति हम इन्सानों को,
कुदरत अब तो दिखा रही है, झलक भी इस कहर में;
बंद करें खिलवाड़ हम, धरा की अमोल निधियों से,
सहेज लें हम इन्हें, डूबने ना दें, समय की बहती नहर में।


अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 11/4/2016 6:43:00 PM

छठ पूजा

 बिहार और बाहर के लोग शायद जानना चाहेंगे कि छठ पूजा क्या है और यह बिहार का सबसे बड़ा त्योहार क्यों है ??

दीपावली के ठीक छः दिन बाद कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की षष्ठी को "सूर्य षष्ठी का व्रत" करने का विधान है।

छठे दिन होने के कारण इसे आम बोलचाल में छठ पर्व कहा जाने लगा । इस दिन भगवान सूर्य व षष्ठी देवी की पूजा की जाती है।

कहते हैं दुनिया उगते सूरज को हमेशा पहले नमन करती है, लेकिन बिहार के लोगो के लिए ऐसा नहीं हैं। बिहार के लोक आस्था से जुड़े पर्व “छठ” का पहला अर्घ्य डूबते हुए सूरज को दिया जाता हैं। इस पर्व की खास परंपरा है लोग झुके हुए को पहले सलाम करते हैं, और उठे हुए को बाद में। लोक आस्था का कुछ ऐसा ही महापर्व हैं “छठ”।

इस दौरान व्रतधारी लगातार 36 घंटे का व्रत रखते हैं। इस दौरान वे पानी भी ग्रहण नहीं करते।

सामूहिकता का हैं प्रतीक: -

सामूहिकता के मामले में बिहारियों का यह पर्व पूरी दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। एक ऐसी मिशाल जो ना केवल आस्था से भरा हैं, बल्कि भेदभाव मिटाकर एक होने का सन्देश भी दे रहा हैं। एक साथ समूह में जल में खड़े हो भगवान् भाष्कर की अर्चना सभी भेदभाव को मिटा देती हैं। भगवान् आदित्य भी हर सुबह यहीं सन्देश लेकर आते हैं, कि किसी से भेदभाव ना करो, इनकी किरणे महलों पर भी उतनी ही पड़ती हैं जितनी की झोपडी पर। इनके लिए ना ही कोई बड़ा हैं ना ही कोई छोटा, सब एक समान हैं। भगवान् सूर्य सुख और दुःख में एक सामान रहने का सन्देश भी देता हैं। इन्ही भगवान् सूर्य की प्रसन्नता के लिए हम छठ पूजा मनाते हैं।

मैया हैं छठ फिर क्यों होती हैं सूर्य की पूजा:-

व्याकरण के अनुसार छठ शब्द स्त्रीलिंग हैं इस वजह से इसे भी इसे छठी मैया कहते हैं। वैसे किवदंती अनके हैं कुछ लोग इन्हें भगवान सूर्य की बहन मानते हैं तो कुछ लोग इन्हें भगवान सूर्य की माँ, खैर जो भी आस्था का ये पर्व हमारे रोम रोम में बसा होता हैं। छठ का नाम सुनते ही हमारा रोम-रोम पुलकित हो जाता हैं और हम गाँव की याद में डूब जाते हैं। इसे करने वाली स्त्रियाँ धन-धान्य, पति-पुत्र तथा सुख-समृद्धि से परिपूर्ण रहती हैं।

दुनिया का सबसे कठिन व्रत:-

चार दिनों यह व्रत दुनिया का सबसे कठिन त्योहारों में से एक हैं। यह व्रत बड़े नियम तथा निष्ठा से किया जाता है। पवित्रता की इतनी मिशाल की व्रती अपने हाथ से ही सारा काम करती हैं। नहाय-खाय से लेकर सुबह के अर्घ्य तक व्रती पूरे निष्ठा का पालन करती हैं। भगवान भास्कर को 36 घंटो का निर्जल व्रत स्त्रियों के लिए जहाँ उनके सुहाग और बेटे की रक्षा करता हैं। वही भगवान् सूर्य धन, धान्य, समृधि आदि पर्दान करता हैं।

सूर्यषष्ठी-व्रत के अवसर पर सायंकालीन प्रथम अर्घ्य से पूर्व मिट्टी की प्रतिमा बनाकर षष्ठीदेवी का आवाहन एवं पूजन करते हैं। पुनः प्रातः अर्घ्य के पूर्व षष्ठीदेवी का पूजन कर विसर्जन कर देते हैं। मान्यता है कि पंचमी के सायंकाल से ही घर में भगवती षष्ठी का आगमन हो जाता है.

व्रत का पहला दिन नहाय खाय:-

पहला दिन कार्तिक शुक्ल चतुर्थी ‘नहाय-खाय’ के रूप में मनाया जाता है। सबसे पहले घर की सफाई कर उसे पवित्र बना लिया जाता है। इसके पश्चात छठव्रती स्नान कर पवित्र तरीके से बने शुद्ध शाकाहारी भोजन ग्रहण कर व्रत की शुरुआत करते हैं। घर के सभी सदस्य व्रती के भोजनोपरांत ही भोजन ग्रहण करते हैं। इस दिन व्रती कद्दू/लौकी/दूधी की सब्जी, चने की दाल, और अरवा चावल का भात खाती हैं।

व्रत का दूसरा दिन लोहंडा और खरना:-

दूसरे दिन कार्तिक शुक्ल पंचमी को व्रतधारी दिन भर का उपवास रखने के बाद शाम को व्रती गन्ने के रस की खीर बनाकर देवकरी में पांच जगह कोशा (मिट्टी के बर्तन) में खीर रखकर उसी से हवन किया जाता है। इसे ‘खरना’ कहा जाता है।

खरना का प्रसाद लेने के लिए आस-पास के सभी लोगों को निमंत्रित किया जाता है। प्रसाद के रूप में गन्ने के रस में बने हुए चावल की खीर के साथ दूध, चावल का पिट्ठा और घी चुपड़ी रोटी बनाई जाती है। इसमें नमक या चीनी का उपयोग नहीं किया जाता है। इस दौरान पूरे घर की स्वच्छता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इसके बाद 36 घंटे का निर्जला (बिना अन्न-जल) उपवास रखा जाता है।

व्रत का तीसरा दिन संध्या अर्घ्य:-

तीसरे दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को दिन में छठ प्रसाद बनाया जाता है। प्रसाद के रूप में ठेकुआ, जिसे कुछ क्षेत्रों में टिकरी या खजूर भी कहते हैं (ठेकुआ पर लकडी के साँचे से सूर्यभगवान्‌ के रथ का चक्र भी अंकित करना आवश्यक माना जाता है), के अलावा चावल के लड्डू, जिसे लड़ुआ भी कहा जाता है, बनाते हैं। इसके अलावा सभी प्रकार के मौसमी फल ईंख, केले, पानीफल सिंघाड़ा, शरीफ़ा, नारियल, मूली, सुथनी, अदरक, गागर नींबू, अखरोट, बादाम, इलायची, लौंग, पान, सुपारी एवं अन्य समान अर्घपात (लाल रंग का), धगगी, लाल/पीले रंग का कपड़ा, एक बड़ा घड़ा जिस पर बारह दीपक लगे हो, गन्ने के बारह पेड़ आदि। आदि छठ प्रसाद के रूप में शामिल होता है।

शाम को पूरी तैयारी और व्यवस्था कर बाँस की टोकरी में अर्घ्य का सूप सजाया जाता है और व्रती के साथ परिवार तथा पड़ोस के सारे लोग अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने घाट की ओर चल पड़ते हैं। सभी छठव्रती एक नीयत तालाब या नदी किनारे इकट्ठा होकर सामूहिक रूप से अर्घ्य दान संपन्न करते हैं। सूर्य को जल और दूध का अर्घ्य दिया जाता है तथा छठी मैया की प्रसाद भरे सूप से पूजा की जाती है। इस दौरान कुछ घंटे के लिए मेले का दृश्य बन जाता है।

छठ पूजा में कोशी भरने की मान्यता है अगर कोई अपने किसी अभीष्ट के लिए छठ मां से मनौती करता है तो वह पूरी करने के लिए कोशी भरी जाती है. नदी किनारे गन्ने का एक समूह बना कर छत्र बनाया जाता है उसके नीचे पूजा का सारा सामान रखा जाता है। इस प्रकार भगवान्‌ सूर्य के इस पावन व्रत में शक्ति और ब्रह्म दोनों की उपासना का फल एक साथ प्राप्त होता है । इसीलिये लोक में यह पर्व ‘सूर्यषष्ठी’ के नाम से विख्यात है।

वर्त का चौथा दिन उषा अर्घ्य:-

चौथे दिन कार्तिक शुक्ल सप्तमी की सुबह उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। व्रती वहीं पुनः इकट्ठा होते हैं जहाँ उन्होंने शाम को अर्घ्य दिया था। पुनः पिछले शाम की प्रक्रिया की पुनरावृत्ति होती है। अंत में व्रती कच्चे दूध का शरबत पीकर तथा थोड़ा प्रसाद खाकर लोक आस्था का महापर्व छठ का समापन करते हैं।

1. ऐसा कहा जाता है की छठ देवी सूर्य देव की बहन हैं और उन्हीं को प्रसन्न करने के लिए जीवन के महत्वपूर्ण अवयवों में सूर्य व जल की महत्ता को मानते हुए, इन्हें साक्षी मान कर भगवान सूर्य की आराधना तथा उनका धन्यवाद करते हुए मां गंगा-यमुना या किसी भी पवित्र नदी या पोखर (तालाब) के किनारे यह पूजा की जाती है।

2. - ऐसा भी कहा जाता है कि भगवान राम के वनवास से लौटने पर राम और सीता ने कार्तिक शुक्ल षष्ठी के दिन उपवास रखकर भगवान सूर्य की आराधना की और सप्तमी के दिन व्रत पूर्ण किया। पवित्र सरयू के तट पर राम-सीता के इस अनुष्ठान से प्रसन्न होकर भगवान सूर्य देव ने उन्हें आशीर्वाद दिया था।

3. - एक अन्य मान्यता के अनुसार जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हारकर जंगल-जंगल भटक रहे थे, तब इस दुर्दशा से छुटकारा पाने के लिए द्रौपदी ने सूर्यदेव की आराधना के लिए छठ व्रत किया। इस व्रत को करने के बाद पांडवों को अपना खोया हुआ वैभव पुन: प्राप्त हो गया था।

4. - ऐसा भी कहा जाता है कि स्वयंभू मनु के पुत्र राजा प्रियव्रत को अधिक समय बीत जाने के बाद भी कोई संतान उत्पन्न नहीं हुई। तदुपरांत महर्षि कश्यप ने पुत्रेष्टि यज्ञ कराकर उनकी पत्नी को चारू (प्रसाद) दिया, जिससे गर्भ तो ठहर गया, किंतु मृत पुत्र उत्पन्न हुआ। प्रियवत उस मृत बालक को लेकर श्मशान गए। पुत्र वियोग में प्रियवत ने भी प्राण त्यागने का प्रयास किया। ठीक उसी समय मणि के समान विमान पर षष्ठी देवी वहां आ पहुंची। मृत बालक को भूमि पर रखकर राजा ने उस देवी को प्रणाम किया और पूछा- हे सुव्रते! आप कौन हैं?

देवी ने आगे कहा:-

तुम मेरा पूजन करो और अन्य लोगों से भी कराओ। इस प्रकार कहकर देवी षष्ठी ने उस बालक को उठा लिया और खेल-खेल में उस बालक को जीवित कर दिया। राजा ने उसी दिन घर जाकर बड़े उत्साह से नियमानुसार षष्ठी देवी की पूजा संपन्न की। चूंकि यह पूजा कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को की गई थी, अत: इस विधि को षष्ठी देवी/छठ देवी का व्रत होने लगा.

यह है इस व्रत का वृतांत iiii

Archana Anupriya

Posted on: 10/31/2016 10:01:00 PM

"नवदुर्गा"
नौ रूपों में तेरे माँ,
ममता की झलक है;
तेरी आभा से रोशन,
ये धरा और फलक है;
तू आकर बस जाए,
हर दिल में हर घर में;
यही चाह है हम सबकी,
तेरे दुलार की ललक है।

नौ रूपों में तेरे माँ,
शक्ति भरी पड़ी है;
धरती पर जब-जब भी,
दानवी बाधा अड़ी है;
हर रूप में आ-आकर,
रक्षक बनी है तू;
अपने बच्चों की खातिर,
तू हर समय खड़ी है।

नौ रूपों में तेरे माँ,
संदेश विजय का है;
शांति, करुणा, सहनशीलता,
हर भाव विनय का है;
नहीं पनप सकती बुराई,
कभी भी तेरे आगे;
वाहन भी तेरा अभेद्य है,
प्रतीक वो जय का है।

नौ रूपों को तेरे माँ,
अपना प्रणाम करती हूँ;
शीश तेरे चरणों में,
मैं सुबह शाम धरती हूँ;
आशीष दो हम सबको,
अपने दुलार से भर दो;
न्याय-पथ पर चलूँगी,
आज यह प्रण करती हूँ।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 10/31/2016 9:59:00 PM

"गरबा का महत्व"

गुजरात में नवरात्रि के समय गरबा करने का बड़ा महत्व है। यह गरबा दर असल प्रकृति का प्रतीकात्मक दर्शन है। गरबा शब्द 'गर्भ' शब्द से बना है। छिद्रों वाली मिट्टी की हाँडी के अंदर दीपक जलाकर प्रकृति के गर्भ को दर्शाते हैं...अर्थात् गर्भ में विकसित होते पिंड में भी चैतन्य का प्रकाश। जिस प्रकार हाँडी में छिद्र हैं उसी प्रकार मानव-शरीर में भी दस छिद्र होते हैं। मतलब यह कि गरबा के द्वारा हम अपने शरीर के चैतन्य-तत्व की ही अराधना करते हैं जो ईश्वरीय अंश है, ईश्वर का वरदान है। मिट्टी की हाँडी में रखा दीप सूर्य का प्रतीक है, छिद्रों से बाहर आते प्रकाश तारामंडल हैं और जैसे सूर्य के चारों तरफ नवग्रह परिक्रमा करते हैं, उसी प्रकार से चारों ओर नृत्य करते हुए घूमना ही गरबा-नृत्य दर्शाता है। यह प्रकृति अपने ग्रहमंडल के साथ सतत भ्रमण करती रहती है, गरबा घूमने का यही संदेश है। माँ के सामने गरबा घूम कर, उन्हें प्रसन्न करते हैं और नवरात्रि मनाते हैं।


अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 10/31/2016 9:53:00 PM

विजयदशमी पर्व के उपलक्ष्य में-

जब न्याय अन्याय से विजयी हो जाए,
जब धर्म अधर्म पर हावी हो जाए,
जब नैतिकता अनैतिकता को परास्त कर दे,
और,
जब हिंसा अहिंसा के आगे अशक्त हो जाए
तब समझो कि विजय-पर्व आ गया....।

लालसा जब संतोष के सामने हार जाए,
हर भूख जब त्याग के नीचे कुचली जाए,
नफरत जब प्रेम में पड़कर बदल जाए,
और,
स्वार्थ जब प्रेम की भक्ति से परमार्थ बन जाए,
तब समझो कि विजय-पर्व आ गया....।

किसी पुतले को जला कर क्या होगा?
कुछ बदलेगा? क्या कुछ नया होगा ?
हाँ, बुराईयों का अंजाम तो बयां होगा..
शायद, अच्छाई के लिए ही रावण जला होगा..
हम सीख लें इनसे और खुद को बदलें,
सच्चाई को समझ लें न कि माया से बहलें,
विजय-पर्व मनाने की सिद्धि तभी मिलेगी हमें,
जब अंदर की अच्छाई जगा लें और बुराई से संभलें..।


अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 10/31/2016 9:51:00 PM

"वक्त का जादू"

सारी उम्र गुजर जाती है घर बनाने में,
पर बुनियाद हिलाकर घर तोड़ने में वक्त नहीं लगता..
मीलों तक कदमों से चलकर मंजिल मिलती है,
पर स्वार्थ के लिए लक्ष्य को ठोकर मारने में वक्त नहीं लगता...
दिल की कई धड़कनें जोड़कर रिश्ते बनते हैं,
पर कड़वी जुबान को रिश्ते तोड़ने में वक्त नहीं लगता...
जाने कितने पल गंवाकर रोटी कमाता है आदमी,
पर भरे पेट से रोटी कूड़े पर फेंकने में वक्त नहीं लगता...
कितनी इन्सानियत जोड़कर नाम पाता है आदमी,
पर भ्रष्ट होकर अपनी औकात गिराने में वक्त नहीं लगता...
बहुत उम्मीदें जोड़कर ख्वाब सजाता है मनु ष्य,
पर धोखे के पत्थर से सपने तोड़ने में वक्त नहीं लगता...
छोटी-छोटी साँसों की लड़ियों से बँधती है जिंदगी,
पर पीठ के खंजर को जिंदगी खत्म करने में वक्त नहीं लगता..
अहंकार से,अभिमान से कितना ही ऊँचा उड़ ले इन्सान,
पर वक्त को उसे जमीन पर लाने में वक्त नहीं लगता...।


अर्चना अनुप्रिया।