Archana Anupriya
MA,LLM, Advocate and Visiting Faculty in MS University
Love Writing and Reading

Articles/Poems/Quotes

 
Posted on: 1/26/2017 7:11:00 PM

खूबियों और खामियों के बीच जंग लाजिमी है,
इन्हीं दो पाटों में तो बँटा हुआ हर आदमी है,
जो जीत जाएँ फिर किस्मत वही तय करती हैं,
इनके आपस के द्वन्द्व का नाम ही तो जिंदगी है।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/26/2017 7:05:00 PM

यादें--

दोस्तों, बचपन हमारी जिंदगी का वो पड़ाव है जो हर व्यक्ति के दिल में आज भी जीवन्त है।सुकून और आनंद से भरे जीवन के उस दौर की यादें आज भी हमारे मुश्किल क्षणों में बहार लेकर आती हैं। 'उछलना, कूदना, खाना, खेलना'---जीवन मानो मस्ती के अलावा कुछ था ही नहीं। निश्छल मन, कोमल कल्पनाएँ और उन कल्पनाओं को हकीकत में बदलने के अजीब-अनोखे से तरीके...याद करके ही मन झूम उठता है।बचपन के जादुई तरीके आज भी कभी कभी हमें मुसीबतों से निकलने में सहायक बन जाते हैं। हैं ना?
तो फिर क्यों न हम आज फिर से उसी मासूमियत को जियें, उसी मस्ती में शामिल हो जाएँ और उसी निश्छलता से सबको अपना लें? शायद ऐसा करके हम आज अपने मन की सारी परेशानियाँ दूर कर सकें और एक बार फिर हमारे जीवन में बस बहार ही बहार हो।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/26/2017 6:45:00 PM

जिंदगी के सफर को आसान कर लिया...
दुश्मनों को भी अपना कद्रदान कर लिया...
मुसीबतें अब मेरे दर पर आने से खौफ खाती हैं..
उम्र के बुझते हौसलों को फिर से जवान कर लिया..।

Posted on: 1/26/2017 6:40:00 PM

हमारी अमीरी भी लाजवाब है, दोस्तों...
'प्रेम, अपनापन, संस्कार,सच्चाई, नैतिकता'...
हम वो सभी मँहगी चीजें रखते हैं..,
जो पैसों से नहीं खरीदी जा सकतीं...।
..अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/26/2017 6:37:00 PM

प्रकृति के हर कण से हम सबके
जन्मों के नाते हैं...
हम खुशबू हमारे जीवन की
सौंधी मिट्टी से ही पाते हैं...
दुख हो या सुख हो सब साथ होते हैं
हम एक हो जाते हैं....
तभी तो हर काल में, हर युग में हम
हर त्योहार मिलकर मनाते हैं..।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/26/2017 6:35:00 PM

अजीब सी सोच ने हम सबको आ घेरा है...,
कभी बस "मैं" हूँ तो कभी सब "मेरा" है...।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/26/2017 6:34:00 PM

लब सिले हैं पर दिल में अल्फाज बहुत हैं,
उनकी खाममोशियों में भी आवाज बहुत हैं..।
. . .अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/25/2017 8:41:00 PM

बातें करके, भाषण देकर, गाने गाकर क्या होगा...?
कभी वतन के काम आओ, तब देश का नमक अदा होगा...।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/17/2017 11:43:00 PM

"मौसम"
सुबह-सुबह की धूप
जाने कहाँ चली जाती है..,
कोहरे की चादर ओढ़े
ठिठुरती सी फिजा,
स्याह बने पेड़-पौधे
हाथ बाँधे चुपचाप खड़े होते हैं..,
पत्तों पर ढलकती
ओस की बूँदें
अंदर की रूह तक भिगो देती हैं...,
कोमल,मुलायम सी घास
नरमी का अहसास कराती हैं..,
छोटे-छोटे गमलों में
खिलते-हँसते फूल
ठंडे अहसासों पर
मुस्कुराहट की गर्मी बिखेर देते हैं..,
फिर, चारों तरफ
फैली कोहरे की सफेदी
रंगीनियों में बदल जाती है...,
और,
कहीं से धुंध को चीर कर
पीली सी गर्म धूप
मन के आंगन में आ गिरती है..,
सचमुच,
मौसम तो हमारे अंदर ही होता है..।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 11/15/2016 8:35:00 PM

` ... वह पहाड़-पुत्र मेघाणी’

काठियावाड़ की धरती पर, खिला अनोखा लाल,
देख-देख जिसको माता की आँखें हुई निहाल.

जंगल, झरने, पर्वत, नदियाँ, थे सब उसके मित्र,
लोकभाषा और लोक-साहित्य से, रचता वह कल्पना-चित्र.

कवि, लेखक, संशोधक, पत्रकार, बना वह स्वतंत्रता-सेनानी,
बहुमुखी प्रतिभा का बालक, नाम – झवेरचंद मेघाणी.

पिता का नाम था कालिदास, माता थीं – धोलीबाई,
सादगी, उच्च संस्कार उन्होंने, माता-पिता से ही पाई.

राजकोट में बीता बचपन, कालेज भावनगर में,
बड़े भाई की सेवा करने, पहुँचा बंगाल शहर में.

की नौकरी कलकत्ता में, बनकर `पगड़ी‌ बाबू’,
गया विदेश पर शीघ्र ही लौटा, उसपे था वतन का जादू.

कूद पड़ा वह स्वातंत्र्य-युध्ध में, लगा जन-चेतना जगाने,
अपनी लेखनी से आजादी की पवित्र मशाल जलाने.

`राजद्रोही’ कहा अँग्रेजों ने, फिर भेज दिया उसे जेल,
वहाँ देशभक्त नेताओं के संग, हुआ फिर उसका मेल.

गाँधी ही आदर्श थे उसके, था देश-गान उसे प्यारा,
`राष्ट्रीय शायर’ की मिली उपाधि, बापूजी के ही द्वारा.

गुरुदेव के आमंत्रण पर, पहुँचा फिर शांतिनिकेतन,
लोकरचना और लोक-गीतों से, वहाँ जीता सबका मन.

`माणसाई’ जब हुआ सम्मानित, `महिड़ा’ पारितोषिक से,
कर दिया अर्पण महाराज के नाम, क्या लेना उसे रकम से.

लीं अंतिम साँसें बोटाद में, घर उसका बना धरोहर,
वह निडर, विद्वान, देशभक्त, बन गया फिर इतिहास अमर.

`सोरठ तारां बहेता पानी’ और `रढियाळी रात’,
हर जन-मानस जुड़ गया, उसके लोक-गीतों के साथ.

जन-जन उसने अलख जगाई, शौर्य, समर्पण, प्यार,
लोक-साहित्य की अमूल्य देन, उसके `सौराष्ट्रनी रसधार’.

आज भी वह फिजा में गुजरात के – कहता है बहता पानी,
घर-घर बसा है गीतों में, वह पहाड़-पुत्र मेघाणी.

- अर्चना `अनुप्रिया'