Archana Anupriya
MA,LLM, Advocate and Visiting Faculty in MS University
Love Writing and Reading

Articles/Poems/Quotes

 
Posted on: 1/26/2017 6:40:00 PM

हमारी अमीरी भी लाजवाब है, दोस्तों...
'प्रेम, अपनापन, संस्कार,सच्चाई, नैतिकता'...
हम वो सभी मँहगी चीजें रखते हैं..,
जो पैसों से नहीं खरीदी जा सकतीं...।
..अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/26/2017 6:37:00 PM

प्रकृति के हर कण से हम सबके
जन्मों के नाते हैं...
हम खुशबू हमारे जीवन की
सौंधी मिट्टी से ही पाते हैं...
दुख हो या सुख हो सब साथ होते हैं
हम एक हो जाते हैं....
तभी तो हर काल में, हर युग में हम
हर त्योहार मिलकर मनाते हैं..।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/26/2017 6:35:00 PM

अजीब सी सोच ने हम सबको आ घेरा है...,
कभी बस "मैं" हूँ तो कभी सब "मेरा" है...।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/26/2017 6:34:00 PM

लब सिले हैं पर दिल में अल्फाज बहुत हैं,
उनकी खाममोशियों में भी आवाज बहुत हैं..।
. . .अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/25/2017 8:41:00 PM

बातें करके, भाषण देकर, गाने गाकर क्या होगा...?
कभी वतन के काम आओ, तब देश का नमक अदा होगा...।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/17/2017 11:43:00 PM

"मौसम"
सुबह-सुबह की धूप
जाने कहाँ चली जाती है..,
कोहरे की चादर ओढ़े
ठिठुरती सी फिजा,
स्याह बने पेड़-पौधे
हाथ बाँधे चुपचाप खड़े होते हैं..,
पत्तों पर ढलकती
ओस की बूँदें
अंदर की रूह तक भिगो देती हैं...,
कोमल,मुलायम सी घास
नरमी का अहसास कराती हैं..,
छोटे-छोटे गमलों में
खिलते-हँसते फूल
ठंडे अहसासों पर
मुस्कुराहट की गर्मी बिखेर देते हैं..,
फिर, चारों तरफ
फैली कोहरे की सफेदी
रंगीनियों में बदल जाती है...,
और,
कहीं से धुंध को चीर कर
पीली सी गर्म धूप
मन के आंगन में आ गिरती है..,
सचमुच,
मौसम तो हमारे अंदर ही होता है..।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 11/15/2016 8:35:00 PM

` ... वह पहाड़-पुत्र मेघाणी’

काठियावाड़ की धरती पर, खिला अनोखा लाल,
देख-देख जिसको माता की आँखें हुई निहाल.

जंगल, झरने, पर्वत, नदियाँ, थे सब उसके मित्र,
लोकभाषा और लोक-साहित्य से, रचता वह कल्पना-चित्र.

कवि, लेखक, संशोधक, पत्रकार, बना वह स्वतंत्रता-सेनानी,
बहुमुखी प्रतिभा का बालक, नाम – झवेरचंद मेघाणी.

पिता का नाम था कालिदास, माता थीं – धोलीबाई,
सादगी, उच्च संस्कार उन्होंने, माता-पिता से ही पाई.

राजकोट में बीता बचपन, कालेज भावनगर में,
बड़े भाई की सेवा करने, पहुँचा बंगाल शहर में.

की नौकरी कलकत्ता में, बनकर `पगड़ी‌ बाबू’,
गया विदेश पर शीघ्र ही लौटा, उसपे था वतन का जादू.

कूद पड़ा वह स्वातंत्र्य-युध्ध में, लगा जन-चेतना जगाने,
अपनी लेखनी से आजादी की पवित्र मशाल जलाने.

`राजद्रोही’ कहा अँग्रेजों ने, फिर भेज दिया उसे जेल,
वहाँ देशभक्त नेताओं के संग, हुआ फिर उसका मेल.

गाँधी ही आदर्श थे उसके, था देश-गान उसे प्यारा,
`राष्ट्रीय शायर’ की मिली उपाधि, बापूजी के ही द्वारा.

गुरुदेव के आमंत्रण पर, पहुँचा फिर शांतिनिकेतन,
लोकरचना और लोक-गीतों से, वहाँ जीता सबका मन.

`माणसाई’ जब हुआ सम्मानित, `महिड़ा’ पारितोषिक से,
कर दिया अर्पण महाराज के नाम, क्या लेना उसे रकम से.

लीं अंतिम साँसें बोटाद में, घर उसका बना धरोहर,
वह निडर, विद्वान, देशभक्त, बन गया फिर इतिहास अमर.

`सोरठ तारां बहेता पानी’ और `रढियाळी रात’,
हर जन-मानस जुड़ गया, उसके लोक-गीतों के साथ.

जन-जन उसने अलख जगाई, शौर्य, समर्पण, प्यार,
लोक-साहित्य की अमूल्य देन, उसके `सौराष्ट्रनी रसधार’.

आज भी वह फिजा में गुजरात के – कहता है बहता पानी,
घर-घर बसा है गीतों में, वह पहाड़-पुत्र मेघाणी.

- अर्चना `अनुप्रिया'

Posted on: 11/15/2016 8:29:00 PM

नारी

नारी की रचना से पहले विधाता ने
सोचा तो क ई बार होगा_
"इसी साहसी जीव के ऊपर संसार के
सृजन का भार होगा" ,
पर उस बनाने वाले ने तो कभी
कल्पना भी नहीं की होगी ,
कि जहाँ में जननी बनकर भी उसका
अपना ही ना कोई अधिकार होगा ।
" प्रेम,त्याग,विश्वास ,ममता की मूर्ति"_
इस रूप से तो प्यार होगा ,
लेकिन दुनिया को अपने स्वार्थ के आगे
नारी का हक ना स्वीकार होगा ।
देख नारी की दुर्दशा समाज में
ईश ने दृढ़ किया ये विचार होगा,
नारी शक्ति की पुनः स्थापना हेतु
अब बदलना यह संसार होगा ।
तभी सब ललनाएँ जाग उठी हैं,
कोई श्रम ना अब बेकार होगा,
हर घर की बेटी जब मान पाएगी
तभी तो जग में बहार होगा ।
अर्चना अनुप्रिया ।

Posted on: 11/15/2016 8:26:00 PM

भाग्य- विधाता

अँधेरा गम का,मायूसी का अब रहने दो,
आशाओं की किरणें फिजा़ में बहने दो,
उठो हौसलों, पंख बनो मेरे सपनों के,
'खुद अपना मैं भाग्य- विधाता'_ कहने दो ।
अर्चना अनुप्रिया ।

 

Posted on: 11/14/2016 7:39:00 PM

"नोट का तमाशा"

अजीब सा तमाशा आज बाजार में चलने लगा है,
हजार का नोट अब दस रुपये के नोट से जलने लगा है...
अदना और तुच्छ समझती रही जिसे दुनिया अब तक,
देखो तो जरा, आज कैसा खुशी से उछलने लगा है!!
भारी लगते थे जो सिक्के गोरियों के कमसिन पर्स में,
अब उन्हीं सिक्कों के लिए इन्सान बेतरह मचलने लगा है..
बड़ी बड़ी जगहों पर बहुत ऐश करते रहे पाँच सौ, हजार,
अब समाज में उनका रुतबा जरा जरा पिघलने लगा है...
लुभाते रहे हर वर्ग,हर मजहब को अपने रूप से हमेशा,
ब्युटीपार्लर जाकर हर बड़ा नोट अब रूप बदलने लगा है..
छोटे नोट एक दूसरे का हाथ थामे अपनी ताकत दिखा रहे
उनकी एकता से डर, हर बड़ा नोट अब सँभलने लगा है...
नोटों की इस उठापटक से हर इन्सान परेशान हुआ है,
खुद को सुल्तान कहने वाला भी सोचने समझने लगा है...
वक्त कब किस करवट बैठे, कोई कह सकता नहीं है,
अब नोट हो या इन्सान-सब वक्त के हाथों ढलने लगा है।

अर्चना अनुप्रिया।