Archana Anupriya
MA,LLM, Advocate and Visiting Faculty in MS University
Love Writing and Reading

Articles/Poems/Quotes

 
Posted on: 5/16/2017 6:33:00 PM

'चाँदनी सी तन्हाई”

चाँदनी रात में

किरणों के धागे से

सपने बुनने लगी हूँ मैं

झिलमिल तारे टाँक के

उनकी चमकती रोशनी में

प्रेम को तकने लगी हूँ मैं

आँखों में आशियाना बनाकर

रहने लगा है कोई

ख्यालों में भी अक्सर अब

बसने लगा है कोई

वो बातें, जिनमें तुम्हारा जिक्र हो

अब सच्ची लगने लगी हैं..

वो तन्हाई, जिनमें तुम्हारा ख्याल हो

अब अच्छी लगने लगी हैं..।

अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 5/1/2017 10:53:00 PM

“हाथ की लकीरें”

मैं अक्सर ये सोचती हूँ…

टेढ़ी-मेढ़ी रेखाएँ

जो हाथों पर बनी होती हैं,

क्या मनु-जीवन की तारें

उन्हीं पर तनी होती हैं ?

श्रम करने वालों की लकीरें

क्या एक जैसी होती हैं?

बिना परिश्रम जो अमीर हो जायें,

उनकी लकीरें कैसी होती हैं ?

ऊपर- नीचे खिंची रेखाएँ

क्या उतार-चढ़ाव दिखाती हैं?

या फिर कर्मों से मिलकर

हर इन्सान की किस्मत बनाती हैं?

मानव के हाव-भाव, कार्य, व्यवहार

लकीरें बनकर हाथों में ढलते हैं

जो जैसे कर्म करता है, वैसे ही

परिणाम उसके जीवन में पलते हैं।

मनुष्य पढ़ते भी हैं लकीरें,

न जाने क्या पाठ पढ़ाती होंगी ?

शायद दुष्कर्मों को सजा सुनाकर

सत्कर्मों के चाक पर चढ़ाती होंगी।

बड़ी अजीब होती हैं ये रेखाएँ,

मुश्किल बहुत है इन्हें समझना,

कभी छलें, कभी साथ दे दें ये,

आसान है क्या इन्हें कर्मों से परखना?

रेखाओं की यह भूलभुलैया,

जीवन की दिशा बताती हैं क्या?

सचमुच सत्कर्मों की मेहनत,

बिगड़ी तकदीर बनाती हैं क्या?

अक्सर मैं यह सोचती हूँ….।

अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 5/1/2017 10:45:00 PM

“बसेरा”- एक लघु कथा

ज्योंहि मैंने अपने बेडरूम की खिड़की खोली,आँखें खुली की खुली रह गयीं। सामने पीले और नारंगी गुलमोहर एक कतार में लगे हवा से झूम रहे थे। साथ में दूसरे छोटे-बड़े हरे पेड़- पौधे झूमते इतने सुहाने लग रहे थे कि मैं बस अपलक ये खूबसूरत नजारा निहारती ही रह गयी। तभी फूलों की भीनी -भीनी खुशबू आकर मेरी साँसों से मिली। मैंने जोर से साँस खींचा और आँखें बंद करके उस खुशबू को महसूस करने लगी। तभी एक गुड़-गुड़ की आवाज से मेरी तन्द्रा टूटी। आँखें खोली तो देखा कि खिड़की के छज्जे पर कबूतर का एक जोड़ा बैठा एक दूसरे से प्रेमालाप कर रहा है।सबसे बेखबर दोनों आपस में मस्त थे।छज्जे के पास से ही एक पेड़ की शाखाएं जा रही थीं जिनपर उन कबूतरों का घोंसला था। बीच-बीच में दोनों घोंसले में जाकर दाने भी चुग आते थे। मेरी वजह से कहीं वे उड़ न जाएं, यह सोच कर मैं धीरे से वहाँ से हट गयी।
अभी दो दिनों पहले ही हम नए घर में शिफ्ट हुए थे। हमारे घर के बगल वाला प्लॉट खाली पड़ा था और वहीं का ये खूबसूरत नजारा दूसरे मंजिले पर स्थित मेरे बेडरूम से दिखता था। मेरे पापा हमेशा कहते थे कि प्रकृति से अच्छा कोई गुरु नहीं, जीवन के हर आयाम सीखा देती है। सचमुच,महानगर मेंं यह प्राकृतिक वातावरण पाकर तो मैं धन्य हो गयी। मैंने अपने नौकर से कहकर कबूतरों के लिए छज्जे पर एक कटोरे में दाने और एक में पानी रखवा दिया। अब तो यह मेरा रोज का नियम बन गया। हर दिन अपना काम निपटाकर मैं खिड़की पर आकर बैठती, कभी कबूतरों को दाना खिलाती, कभी गिलहरियों की रेस देखती।कभी पेड़ पर उछलते , खेलते, झगड़ते पक्षियों को देखती, कभी नीचे से भौंकते और दूसरे अन्य जीवों पर गुर्राते कुत्तों का खेल देखती। बड़ा ही मनोरम था सब कुछ। धीरे-धीरे मैं अपनेआप ही सबकी साथी बन गयी। बड़ा मजा आ रहा था। कुछ ही दिनों में कबूतरी ने अंडे दिए। मेरी भी जिम्मेवारी बढ़ गयी। रह-रह कर मैं घोंसले का निरीक्षण करती कि कहीं कोई अंडों को नुकसान ना पहुँचा दे। 
इसी बीच गर्मियों में बच्चों की छुट्टियां हुईं और घर जाने तथा घूमने- फिरने का प्रोग्राम बन गया। बहुत दिनों से हम कहीं निकले नहीं थे, लिहाजा पति ने ऑफिस से छुट्टी ले ली और एक साथ डेढ़-दो महीने का प्रोग्राम बना लिया। हम छुट्टियों के लिए निकल पड़े। जाते समय भी मैंने अपने नौकर को अंडों का ध्यान रखने को कह दिया।
दो महीने बाद वापस आकर जब मैंने अपने बेडरूम की खिड़की खोली तो मेरी चीख निकल गई । सामने न तो कोई पेड़ था, न हरियाली थी और न ही कोई पक्षी। सारी जमीन खुदी पड़ी थी और जगह-जगह लोहे की छड़, सीमेन्ट के बोरे और बड़ी बड़ी मशीनें रखी थीं। पता चला कि जमीन बिक गयी है और बहुत बड़ा अपार्टमेंट बनने वाला है। मैं तो लगभग रो पड़ी, मन व्याकुल हो उठा कि मेरे प्यारे मूक साथी कहाँ गये होंगे। उन कबूतरों को याद करके मेरी आँखों में आँसू भर गये।क्यों मनुष्य इतना पैसों के लिए पागल है कि उसे ना तो हरियाली दिखती है ना ही जीव-जन्तुओं का बसेरा ? इन मूक जीवों का बसेरा उजाड़ कर लोगों को घर बेचा जाएगा, भला ऐसा घर किस काम का ? किसी जीव की खुशियाँ अंडों से बाहर आने वाली थीं, जब कटे पेड़ के साथ उनका घोंसला इतनी ऊँचाई से गिरा होगा तो उन मासूम कबूतरों को कैसा लगा होगा? सोचकर मैं रो पड़ी। हर वक्त चहकने वाला माहौल मेरी सिसकियों में डूब रहा था। तभी मुझे गुड़ गुड़ की आवाज सुनाई दी। एक पल तो लगा कि भ्रम है पर अगले पल जब नीचे झाँक कर देखा तो मेरी बाँछे खिल गयीं। एक टूटी सी टोकरी जो मेरे छज्जे पर गिर पड़ी थी, अब कबूतरों का बसेरा बन गयी थी। बाकी पक्षी तो बसेरा लेने इधर -उधर चले गए थे पर उन कबूतरों ने अपने घोंसले को मेरे छज्जे पर उस टोकरी में शिफ्ट कर लिया था। उसमें से दो नन्हें- नन्हें बच्चे बड़ी मासूमियत से मुझे देख रहे थे। मेरी खुशी का तो ठिकाना नहीं रहा। मैंने मन ही मन भगवान को धन्यवाद कहा और आँसू भरी आँखों से उनके लिये दाने का इन्तजाम करने के लिए चल पड़ी।आज मुझे भी पंख मिल गये थे।

. अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 3/28/2017 7:31:00 PM

“कॉफी का प्याला”

मेघा अपनी तारीफ में बोले ही जा रही थी--”मैंने अपनी जिंदगी में बहुत उतार-चढ़ाव देखे हैं, पर कभी हिम्मत नहीं हारी। दुनिया चाहती थी कि मैं टूट जाऊँ पर मैंने सबको बता दिया कि पत्थर की हूँ मैं, इतनी आसानी से टूट नहीं सकती। हर कदम पर मैंने स्वयं खुद को सँभाला है। कितनी लड़कियाँ इतना कर पाती हैं आजकल….?”अपने पति और ससुराल को छोड़कर अलग रहने वाली मेघा बड़े शान से अपनी माँ को अपनी आपबीती बता रही थी। मेघा की माँ एकटक अपनी बेटी के चेहरे को निहार रही थी, जिसपर अहंकार साफ झलक रहा था।
मेघा हमेशा से ही जिद्दी थी। उसे लगता था कि वह जो भी कर रही है ,वही सही है। माँ ने समझाया--”बेटा, दूसरों पर दोष लगाना और खुद को सही बताना तो बड़ा आसान होता है, पर तुम सचमुच सही हो या नहीं-ये तो तुम्हारा जमीर ही बता सकता है।” मेघा बिफर गयी--”क्या माँ तुम भी… तुम्हें तो गर्व होना चाहिए कि तुम्हारी बेटी इतनी स्ट्राँग है।” माँ ने कोई जवाब नहीं दिया। वह मेघा को किचन में ले गयीं। गैस जलाकर तीन बर्तनों में पानी उबलने को रखा। एक बर्तन में गाजर डाला, दूसरे में अंडा डाला और तीसरे बर्तन में कॉफी के दाने डाल दिए,और फिर मेघा के साथ बैठकर इधर-उधर की बातें करने लगीं। मेघा को माँ का बर्ताव कुछ अजीब सा लगा पर वह अपने गुणगान में लगी रही।
दस मिनट के बाद माँ उठीं और गैस बंद कर दिया।उबले गाजर और अंडे को एक प्लेट में निकाला और फिर कॉफी प्याले में भरकर मेघा को पीने के लिए दिया। मेघा कॉफी पीने लगी। माँ ने पूछा-”कैसी लगी कॉफी ?” मेघा ने कहा--”बहुत अच्छी है, पर मुझे यह समझ नहीं आ रहा है कि तुम कर क्या रही हो ?” माँ ने कहा--”बेटा, मैं तुम्हें जिंदगी का फलसफा समझाना चाह रही हूँ। गाजर, अंडा और कॉफी-तीनों अलग -अलग गुण वाली चीजें होकर भी एक तरह की परिस्थिति से गुजरे हैं। तीनों ने बराबर ताप सहा, एक जैसे ही विपरीत परिस्थिति से लड़े हैं लेकिन तीनों की प्रतिक्रिया अलग-अलग हुई है। गाजर ,जो देखने में तो कठोर लगता था, विपरीत परिस्थिति आते ही नरम हो गया,एक सीमा से ज्यादा आँच को बर्दाश्त नहीं कर पाया और अंदर ही अंदर गलता रहा।

अंडा,जो पहले नाजुक था,एक झटके में टूट सकता था, विपरीत परिस्थिति में कठोर हो गया।अपनी कोमलता गँवा दी उसने।अब वह किसी को भी चोट पहुँचा सकता है।
कॉफी के दाने, देखने में तो छोटे से थे पर वे पानी में घुल गए और उन्होंने पानी के स्वभाव को बदल दिया। परिस्थितियाँ विपरीत होने पर भी उन्होंने अपना गुण नहीं छोड़ा बल्कि परिस्थिति को ही खुशनुमा कर दिया।
इसीलिए परिस्थिति कितनी ही विपरीत हो, जो इन्सान उस परिस्थिति को सबके लिए खूबसूरत बना दे, दर असल वही इन्सान सही मायने में विजेता माना जायेगा। जो टूट जाए, उससे उम्मीद करना बेकार है, जो कठोर हो जाए, उससे तो बिल्कुल ही बचकर रहना चाहिए। हमेशा उस इन्सान को अपना आदर्श बनाओ जो विपरीत परिस्थिति को भी अपने और अपने परिवार के लिए खुशनुमा बनाने का हौसला रखता हो।”
माँ की बातें सुनकर मेघा जैसे नींद से जाग गयी। उसे अपने लिए एक नयी दिशा मिल गयी ।कॉफी के उस प्याले ने उसकी सोच बदल दी थी। उसने कॉफी के प्याले को चूम लिया और माँ से लिपट गयी। मन ही मन में उसने कॉफी के गुणों को अपनाने की और ससुराल वापस जाने की ठान ली थी।
.. अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 3/24/2017 6:50:00 PM

"भारत का गर्व-बिहार"

जिस भूमि के कण-कण में बसी हुई है गंगा,
हर जन के संस्कार में जहाँ रची हुई है गंगा,
जिसका अमर इतिहास सारे देश का श्रृंगार है,
हमें नाज है उस भूमि पर,वो हम सबका बिहार है।

गणित से खगोल तक--न जाने कितने सूत्र दिए,
अशोक से कुवंर सिंह तक--कितने ही वीर पुत्र दिए,
जिस धरती से गाँधी जी ने अँग्रेजों को दी ललकार है,
उस आंदोलन की मशाल लिये ये हम सबका बिहार है।

सीता की जन्मभूमि, बौद्ध औ' जैन धर्मों का प्रणेता,
शेरशाह जैसा शासक और राजेंद्र प्रसाद जैसे नेता,
जहाँ नालंदा और विक्रमशीला जैसा ज्ञान का भंडार है,
आर्यभट्ट,चाणक्य, कालिदास की भूमि है,हमारा बिहार है।

गुरू गोविंद का जन्मस्थल, माँ सती का सिद्ध स्थान है,
विष्णु के जहाँ चरण-कमल हैं, विशाल योग-संस्थान है,
जिस पावन भूमि पर होता समस्त पितरों का उद्धार है,
विश्व के पहले गणतंत्र की धरती, वो हम सबका बिहार है।

हर जन में इतनी शक्ति है कि युग को बदल सकता है,
आज भी ऐसी भक्ति है,कोई'विद्यापति' बन सकता है,
पूरे विश्व को अब फिर से नयी दिशा देने का विचार है,
सारी धरती को परिवार बना ले, ऐसा हमारा बिहार है।

अर्चना अनुप्रिया।

मुझे चाहत नहीं,मैं देवी बनूं;
शक्ति का पर्याय कहलाऊँ,
करुणा की वेदी बनूं।
चाह मुझे बस इतनी
      कि मैं इन्सान रहूँ,
खुलकर साँस लूँ,
      अविरल धारा सी बहूँ,
खुले आसमान में
        पंख फैलाकर उड़ूँ,
सपने देखूँ,
            उसे पूरा करूँ ।
अपने प्रेम को हँसता देखूँ,
अपनी ममता को फलता देखूँ,
तुम बस हमारी खुशियाँ,

हर पल चाहतों में
  हमारी पलने दो,
देवी नहीं, नारी हूँ मैं,
  मुझे नारी ही रहने दो ।

देवी का दर्जा दिया पर,
तुमने बस लूटा मुझको,
  कुछ कहा नहीं,
            ना दिखा सकी,
  दिल अपना टूटा सबको,
  कभी सीता, कभी द्रौपदी बनी
  फिर निर्भया बन बलि चढ़ी;
  तुमने मुझको दगा दिया,
  मैंने दिया संसार तुम्हें;
  जन्म दिया मैंने तुमको,
  तुमने दिया बाजार मुझे।

बहुत सुन ली झूठी तसल्ली,
अब खोखली बातें बंद करो,
        जीवन मेरा मुझे जीने दो,
        दिल के जख्म गहरे हैं,
          उन्हें अब मुझे सीने दो ।
  व्यथित हूँ तुम्हारे व्यवहार से;
    जलती रही हूँ,
                  तानों के अंगार से;
    मुझे अब व्यथा ,
                  अपनी सारी कहने दो;
    देवी नहीं, नारी हूँ मैं,
      मुझे बस नारी ही रहने दो ।
                    अर्चना अनुप्रिया ।       

Posted on: 2/24/2017 7:39:00 PM

ना आदि है, ना अंत है,
सीमाएं भी अनंत हैं,
हैं "ऊँ" के आकार में,
जिनसे सृष्टि जीवन्त है।

हर काल के कपाल हैं,
हम सबके महाकाल हैं,
विभोर भी, वीभत्स भी,
वैकुण्ठ भी हैं, पाताल हैं।

सब देवों के देव हैं,
कण-कण में एकमेव हैं,
पी के विष भी जो मगन हैं,
वह मृत्युंजय हैं, महादेव हैं।

अंधकार वही, प्रकाश वही,
मृत्यु वही और श्वास वही,
हर रचना में, हर पल में वही,
पत्थर-वृक्ष वही, हाड़-मांस वही।

जन्म और मृत्यु से परे,
सदा रहते समाधि में खड़े,
किसी भी सोच से ऊपर हैं,
अनंत शक्तियों से जड़े ।

ध्वनि में ओम् कार हैं,
हर कला का आधार हैं,
मोक्ष का सुन्दर स्वरूप हैं,
हर सत्य से एकाकार हैं।

नमन शिव, नमन हे शंकर!
हे परमपिता, हे परमेश्वर !
हम सब पर कृपा करो अपनी,
हमें सँभालो, हे करुणाकर !

हे शिव शंकर ! हे शिव शंकर !
अर्चना अनुप्रिया।
महाशिवरात्रि की शुभकामनाएं.......!

Posted on: 2/21/2017 7:56:00 PM

बेजान पत्थरों में भी जान होती है...
कभी तराश कर देखो, बोल उठेंगे...।
                         अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 2/21/2017 7:16:00 PM

कीमत पानी की नहीं, प्यास की होती है..
कीमत मृत्यु की नहीं, श्वास की होती है..
संबंध तो जीवन में कई होते हैं, लेकिन..
कीमत संबंध की नहीं, उनमें छुपे विश्वास की होती है.।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 1/31/2017 11:17:00 PM

हे माँ शारदे, वर दे,
माँ वीणावादिनी वर दे...
मुझ अज्ञानी की वाणी को,
अपने संस्कारों से भरा स्वर दे,
माँ वीणावादिनी वर दे....।

हूँ मिट्टी की काया केवल,
मोह माया में मगन मैं,
पा लूँ तुझको अपने अंदर,
लगाऊँ कैसे ये लगन मैं ?
मेरी रूह को अपने उज्जवल
प्रकाश से भर दे...
हे माँ शारदे, वर दे
माँ वीणावादिनी वर दे...।

अच्छे-बुरे का ज्ञान नहीं माँ,
ना इतनी समझ है मुझमें,
बड़ी अनोखी जाल ये दुनिया,
बँधी जग के उलझन में,
मुझ निर्बल, अदना पर माँ
तू अपनी परम कृपा कर दे..
हे माँ शारदे, वर दे
माँ वीणावादिनी, वर दे...।

सच और झूठ- तू सब जानती है,
हर न्याय-अन्याय की भाषा,
तेरे हंस के इन्हीं गुणों से,
दुनिया को मिले दिलासा,
अपनी वीणा के मधुर गान से,
जग के सारे दुःख हर ले...
हे माँ शारदे, वर दे
माँ वीणावादिनी, वर दे...।
अर्चना अनुप्रिया।

 
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