Archana Anupriya
MA,LLM, Advocate and Visiting Faculty in MS University
Love Writing and Reading

Articles/Poems

 
Posted on: 1/17/2017 11:43:00 PM

"मौसम"
सुबह-सुबह की धूप
जाने कहाँ चली जाती है..,
कोहरे की चादर ओढ़े
ठिठुरती सी फिजा,
स्याह बने पेड़-पौधे
हाथ बाँधे चुपचाप खड़े होते हैं..,
पत्तों पर ढलकती
ओस की बूँदें
अंदर की रूह तक भिगो देती हैं...,
कोमल,मुलायम सी घास
नरमी का अहसास कराती हैं..,
छोटे-छोटे गमलों में
खिलते-हँसते फूल
ठंडे अहसासों पर
मुस्कुराहट की गर्मी बिखेर देते हैं..,
फिर, चारों तरफ
फैली कोहरे की सफेदी
रंगीनियों में बदल जाती है...,
और,
कहीं से धुंध को चीर कर
पीली सी गर्म धूप
मन के आंगन में आ गिरती है..,
सचमुच,
मौसम तो हमारे अंदर ही होता है..।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 11/15/2016 8:35:00 PM

` ... वह पहाड़-पुत्र मेघाणी’

काठियावाड़ की धरती पर, खिला अनोखा लाल,
देख-देख जिसको माता की आँखें हुई निहाल.

जंगल, झरने, पर्वत, नदियाँ, थे सब उसके मित्र,
लोकभाषा और लोक-साहित्य से, रचता वह कल्पना-चित्र.

कवि, लेखक, संशोधक, पत्रकार, बना वह स्वतंत्रता-सेनानी,
बहुमुखी प्रतिभा का बालक, नाम – झवेरचंद मेघाणी.

पिता का नाम था कालिदास, माता थीं – धोलीबाई,
सादगी, उच्च संस्कार उन्होंने, माता-पिता से ही पाई.

राजकोट में बीता बचपन, कालेज भावनगर में,
बड़े भाई की सेवा करने, पहुँचा बंगाल शहर में.

की नौकरी कलकत्ता में, बनकर `पगड़ी‌ बाबू’,
गया विदेश पर शीघ्र ही लौटा, उसपे था वतन का जादू.

कूद पड़ा वह स्वातंत्र्य-युध्ध में, लगा जन-चेतना जगाने,
अपनी लेखनी से आजादी की पवित्र मशाल जलाने.

`राजद्रोही’ कहा अँग्रेजों ने, फिर भेज दिया उसे जेल,
वहाँ देशभक्त नेताओं के संग, हुआ फिर उसका मेल.

गाँधी ही आदर्श थे उसके, था देश-गान उसे प्यारा,
`राष्ट्रीय शायर’ की मिली उपाधि, बापूजी के ही द्वारा.

गुरुदेव के आमंत्रण पर, पहुँचा फिर शांतिनिकेतन,
लोकरचना और लोक-गीतों से, वहाँ जीता सबका मन.

`माणसाई’ जब हुआ सम्मानित, `महिड़ा’ पारितोषिक से,
कर दिया अर्पण महाराज के नाम, क्या लेना उसे रकम से.

लीं अंतिम साँसें बोटाद में, घर उसका बना धरोहर,
वह निडर, विद्वान, देशभक्त, बन गया फिर इतिहास अमर.

`सोरठ तारां बहेता पानी’ और `रढियाळी रात’,
हर जन-मानस जुड़ गया, उसके लोक-गीतों के साथ.

जन-जन उसने अलख जगाई, शौर्य, समर्पण, प्यार,
लोक-साहित्य की अमूल्य देन, उसके `सौराष्ट्रनी रसधार’.

आज भी वह फिजा में गुजरात के – कहता है बहता पानी,
घर-घर बसा है गीतों में, वह पहाड़-पुत्र मेघाणी.

- अर्चना `अनुप्रिया'

Posted on: 11/15/2016 8:29:00 PM

नारी

नारी की रचना से पहले विधाता ने
सोचा तो क ई बार होगा_
"इसी साहसी जीव के ऊपर संसार के
सृजन का भार होगा" ,
पर उस बनाने वाले ने तो कभी
कल्पना भी नहीं की होगी ,
कि जहाँ में जननी बनकर भी उसका
अपना ही ना कोई अधिकार होगा ।
" प्रेम,त्याग,विश्वास ,ममता की मूर्ति"_
इस रूप से तो प्यार होगा ,
लेकिन दुनिया को अपने स्वार्थ के आगे
नारी का हक ना स्वीकार होगा ।
देख नारी की दुर्दशा समाज में
ईश ने दृढ़ किया ये विचार होगा,
नारी शक्ति की पुनः स्थापना हेतु
अब बदलना यह संसार होगा ।
तभी सब ललनाएँ जाग उठी हैं,
कोई श्रम ना अब बेकार होगा,
हर घर की बेटी जब मान पाएगी
तभी तो जग में बहार होगा ।
अर्चना अनुप्रिया ।

Posted on: 11/15/2016 8:26:00 PM

भाग्य- विधाता

अँधेरा गम का,मायूसी का अब रहने दो,
आशाओं की किरणें फिजा़ में बहने दो,
उठो हौसलों, पंख बनो मेरे सपनों के,
'खुद अपना मैं भाग्य- विधाता'_ कहने दो ।
अर्चना अनुप्रिया ।

 

Posted on: 11/14/2016 7:39:00 PM

"नोट का तमाशा"

अजीब सा तमाशा आज बाजार में चलने लगा है,
हजार का नोट अब दस रुपये के नोट से जलने लगा है...
अदना और तुच्छ समझती रही जिसे दुनिया अब तक,
देखो तो जरा, आज कैसा खुशी से उछलने लगा है!!
भारी लगते थे जो सिक्के गोरियों के कमसिन पर्स में,
अब उन्हीं सिक्कों के लिए इन्सान बेतरह मचलने लगा है..
बड़ी बड़ी जगहों पर बहुत ऐश करते रहे पाँच सौ, हजार,
अब समाज में उनका रुतबा जरा जरा पिघलने लगा है...
लुभाते रहे हर वर्ग,हर मजहब को अपने रूप से हमेशा,
ब्युटीपार्लर जाकर हर बड़ा नोट अब रूप बदलने लगा है..
छोटे नोट एक दूसरे का हाथ थामे अपनी ताकत दिखा रहे
उनकी एकता से डर, हर बड़ा नोट अब सँभलने लगा है...
नोटों की इस उठापटक से हर इन्सान परेशान हुआ है,
खुद को सुल्तान कहने वाला भी सोचने समझने लगा है...
वक्त कब किस करवट बैठे, कोई कह सकता नहीं है,
अब नोट हो या इन्सान-सब वक्त के हाथों ढलने लगा है।

अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 11/9/2016 8:04:00 PM

 

दिल्ली के प्रदूषण पर विशेष....

धुआं-धुआं सा फैला हुआ है चारों तरफ,
रोशनी भी निढाल सी है, कोहरे के इस शहर में;
निःशब्द मूक से खड़े हुए हैं पेड़-पौधे,
अँधियारा सा छाया हुआ है, भरी सी दोपहर में;
हैरान है इन्सान देख खुद अपनी करनी को,
घुटने लगीं हैं साँसें भी, अब तो फैले इस जहर में;
आँखें पथरायी सी अब तो बस जलने लगी हैं,
कितना कोई बचाए खुद को, जहरीली इस लहर में;
झटके दे-देकर जगा रही प्रकृति हम इन्सानों को,
कुदरत अब तो दिखा रही है, झलक भी इस कहर में;
बंद करें खिलवाड़ हम, धरा की अमोल निधियों से,
सहेज लें हम इन्हें, डूबने ना दें, समय की बहती नहर में।


अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 10/31/2016 10:01:00 PM

"नवदुर्गा"
नौ रूपों में तेरे माँ,
ममता की झलक है;
तेरी आभा से रोशन,
ये धरा और फलक है;
तू आकर बस जाए,
हर दिल में हर घर में;
यही चाह है हम सबकी,
तेरे दुलार की ललक है।

नौ रूपों में तेरे माँ,
शक्ति भरी पड़ी है;
धरती पर जब-जब भी,
दानवी बाधा अड़ी है;
हर रूप में आ-आकर,
रक्षक बनी है तू;
अपने बच्चों की खातिर,
तू हर समय खड़ी है।

नौ रूपों में तेरे माँ,
संदेश विजय का है;
शांति, करुणा, सहनशीलता,
हर भाव विनय का है;
नहीं पनप सकती बुराई,
कभी भी तेरे आगे;
वाहन भी तेरा अभेद्य है,
प्रतीक वो जय का है।

नौ रूपों को तेरे माँ,
अपना प्रणाम करती हूँ;
शीश तेरे चरणों में,
मैं सुबह शाम धरती हूँ;
आशीष दो हम सबको,
अपने दुलार से भर दो;
न्याय-पथ पर चलूँगी,
आज यह प्रण करती हूँ।
अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 10/31/2016 9:53:00 PM

विजयदशमी पर्व के उपलक्ष्य में-

जब न्याय अन्याय से विजयी हो जाए,
जब धर्म अधर्म पर हावी हो जाए,
जब नैतिकता अनैतिकता को परास्त कर दे,
और,
जब हिंसा अहिंसा के आगे अशक्त हो जाए
तब समझो कि विजय-पर्व आ गया....।

लालसा जब संतोष के सामने हार जाए,
हर भूख जब त्याग के नीचे कुचली जाए,
नफरत जब प्रेम में पड़कर बदल जाए,
और,
स्वार्थ जब प्रेम की भक्ति से परमार्थ बन जाए,
तब समझो कि विजय-पर्व आ गया....।

किसी पुतले को जला कर क्या होगा?
कुछ बदलेगा? क्या कुछ नया होगा ?
हाँ, बुराईयों का अंजाम तो बयां होगा..
शायद, अच्छाई के लिए ही रावण जला होगा..
हम सीख लें इनसे और खुद को बदलें,
सच्चाई को समझ लें न कि माया से बहलें,
विजय-पर्व मनाने की सिद्धि तभी मिलेगी हमें,
जब अंदर की अच्छाई जगा लें और बुराई से संभलें..।


अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 10/31/2016 9:51:00 PM

"वक्त का जादू"

सारी उम्र गुजर जाती है घर बनाने में,
पर बुनियाद हिलाकर घर तोड़ने में वक्त नहीं लगता..
मीलों तक कदमों से चलकर मंजिल मिलती है,
पर स्वार्थ के लिए लक्ष्य को ठोकर मारने में वक्त नहीं लगता...
दिल की कई धड़कनें जोड़कर रिश्ते बनते हैं,
पर कड़वी जुबान को रिश्ते तोड़ने में वक्त नहीं लगता...
जाने कितने पल गंवाकर रोटी कमाता है आदमी,
पर भरे पेट से रोटी कूड़े पर फेंकने में वक्त नहीं लगता...
कितनी इन्सानियत जोड़कर नाम पाता है आदमी,
पर भ्रष्ट होकर अपनी औकात गिराने में वक्त नहीं लगता...
बहुत उम्मीदें जोड़कर ख्वाब सजाता है मनु ष्य,
पर धोखे के पत्थर से सपने तोड़ने में वक्त नहीं लगता...
छोटी-छोटी साँसों की लड़ियों से बँधती है जिंदगी,
पर पीठ के खंजर को जिंदगी खत्म करने में वक्त नहीं लगता..
अहंकार से,अभिमान से कितना ही ऊँचा उड़ ले इन्सान,
पर वक्त को उसे जमीन पर लाने में वक्त नहीं लगता...।


अर्चना अनुप्रिया।

Posted on: 10/31/2016 9:48:00 PM

फुटपाथ की दीवाली-

नगर को दीपक सजा रहे थे,
प्रकाश अमावस को लजा रहे थे,
सभी दुकानें भरी पड़ी थीं,
हर तरफ रौशनी की लड़ी थी,
लोग मस्ती में झूम रहे थे,
एक दूजे संग घूम रहे थे _
तभी कुछ बच्चे दिखे फुटपाथ पर,
अकेले से लगे ,थे सभी साथ मगर,
अपलक दुकानें निहार रहे थे,
आँखों से मानो पुकार रहे थे,
सपने भरे थे पर पेट थे खाली,
नयनों से मना रहे थे दीवाली,
राकेट,बम,फुलझड़ी,अनार,
दूर से देते उन्हें खुशियाँ हजार,
आकाश में छूटते रंगीं नजारे,
भुला रहे थे उनके दुख सारे,
उछल उछल वे नाच रहे थे,
कुछ गिरे पटाखे जाँच रहे थे,
एक उनमें से टॉफी ले आया,
बाँट-बाँट फिर सबने खाया,
मिठास में घुल गया उनका जहाँ,
था खाने को कुछ और कहाँ?
फिर भी मगन हो गा रहे थे,
'लक्ष्मी' को जीना सिखा रहे थे,
हतप्रभ सी मैं खड़ी रही थी,
मेरी हैरान आँखों में नमी थी,
समाज पर गुस्सा फूट रहा था,
इस खाई से दिल टूट रहा था,
चाहा रौशन करूँ रात ये काली,
खुशियों से भर दूँ उनकी दीवाली,
पास जा उनके मेरी दुनिया बदल गयी,
मैं उन्हें साथ ले बाजार निकल गयी ।


अर्चना अनुप्रिया ।

 
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